एकादशी व्रत के नियम: क्या खाएँ, पारण का समय और स्मार्त-वैष्णव तिथि
एकादशी व्रत की व्यावहारिक जानकारी: व्रत के प्रकार, क्या खाएँ और क्या न खाएँ, पारण कैसे करें और कभी-कभी दो एकादशी तिथियाँ क्यों दी जाती हैं।
हर पक्ष की ग्यारहवीं तिथि एकादशी हिंदू धर्म का सबसे अधिक रखा जाने वाला व्रत है। यह महीने में दो बार आती है, यानी सामान्य वर्ष में 24 और अधिक मास वाले वर्ष में 26 एकादशियाँ। हर एक का नाम और पुराणों में कथा है, ज्येष्ठ की गर्मी में निर्जला एकादशी से लेकर देवउठनी एकादशी तक, जब भगवान विष्णु चार महीने की निद्रा से जागते हैं।
अपनी योजना के लिए आगामी एकादशी तिथियाँ देखें।
एकादशी क्यों रखी जाती है
पद्म पुराण के अनुसार एकादशी देवी भगवान विष्णु से प्रकट हुईं और मुर नामक दैत्य का वध किया। प्रसन्न होकर विष्णु ने वरदान दिया कि उनके दिन व्रत रखने वाला पापों से मुक्त होगा। कथा के अलावा यह एक साधना है: हर पक्ष में एक दिन भोजन और सांसारिक कामों से थोड़ा हटकर मन को प्रार्थना, जप और दान में लगाना।
एकादशी व्रत के प्रकार
अपने स्वास्थ्य और परंपरा के अनुसार चुनें:
- निर्जला: एकादशी के सूर्योदय से द्वादशी के पारण तक बिना अन्न और जल के। परंपरागत रूप से निर्जला एकादशी पर रखा जाता है।
- जलाहार: केवल जल।
- फलाहार: फल, दूध और व्रत में मान्य भोजन।
- एकभुक्त: बिना अन्न का एक सात्विक भोजन।
बुज़ुर्ग, गर्भवती, बीमार या दवा लेने वाले लोग हल्का व्रत चुनें या डॉक्टर से सलाह लें। परंपरा कठोरता से अधिक श्रद्धा को महत्व देती है।
क्या न खाएँ
- सभी अन्न: चावल, गेहूँ, बाजरा, मक्का, जौ
- दालें और फलियाँ: दाल, चना, राजमा
- प्याज़, लहसुन, और कई घरों में इमली व कुछ मसाले
- मांसाहार और मद्य
विशेष रूप से चावल वर्जित है। लोक मान्यता है कि इस दिन पाप अन्न में निवास करता है।
क्या खा सकते हैं
- फल, सूखे मेवे
- दूध, दही, पनीर और घी
- आलू, शकरकंद, अरबी, कद्दू और कच्चा केला
- साबूदाना, सिंघाड़े का आटा, कुट्टू का आटा, राजगिरा और समा के चावल
- सेंधा नमक, काली मिर्च, जीरा और हरी मिर्च
परिवार की परंपरा अलग हो सकती है, इसलिए वही मानें जो आपके घर में मान्य है।
पारण: व्रत सही तरीके से खोलना
व्रत खोलना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। पारण द्वादशी को, यानी एकादशी के अगले दिन किया जाता है:
- पारण द्वादशी के सूर्योदय के बाद करें।
- द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले पूरा करें। द्वादशी के बाद व्रत खोलना दोष माना जाता है।
- हरि वासर, यानी द्वादशी का पहला चौथाई भाग, बीत जाने दें।
- प्रातःकाल उत्तम है; संभव हो तो मध्याह्न में पारण न करें।
एकादशी के अगले दिन अपने शहर के पंचांग में द्वादशी का समाप्ति समय देखें।
स्मार्त और वैष्णव एकादशी: दो तारीखें क्यों?
कभी एक ही पक्ष में दो एकादशी तिथियाँ लिखी होती हैं। ऐसा तब होता है जब एकादशी लगातार दो सूर्योदयों पर हो, या अरुणोदय के समय दशमी हो।
- स्मार्त परिवार सामान्यतः पहले दिन व्रत रखते हैं, जब सूर्योदय पर एकादशी हो।
- वैष्णव परंपराएँ (इस्कॉन, पुष्टिमार्ग आदि) अरुणोदय (सूर्योदय से लगभग 96 मिनट पहले) पर दशमी से "विद्ध" एकादशी से बचती हैं और प्रायः दूसरे दिन व्रत रखती हैं।
हमारी एकादशी सूची स्मार्त सूर्योदय नियम का पालन करती है और जब वैष्णव व्रत अगले दिन हो, तब सूचना देती है। किसी संप्रदाय से जुड़े हों तो उसी का कैलेंडर मानें।
व्रत की सरल दिनचर्या
- दशमी की शाम: सूर्यास्त से पहले हल्का सात्विक भोजन करें और उसके बाद अन्न न लें।
- एकादशी की सुबह: जल्दी स्नान करें, भगवान विष्णु के सामने संकल्प लें और तुलसी, पुष्प व दीप अर्पित करें। पूजा के अंत में विष्णु जी की आरती करें।
- दिन में: उस एकादशी की व्रत कथा पढ़ें, ॐ नमो भगवते वासुदेवाय या विष्णु सहस्रनाम का जप करें (स्पिरिचुअल मार्ग पर मंत्र देखें), गिनती के लिए नाम जप काउंटर का उपयोग करें, और क्रोध, निंदा व दिन में सोने से बचें। एकादशी पर श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ परंपरागत रूप से शुभ है।
- रात: कई भक्त भजन के साथ जागरण करते हैं।
- द्वादशी: सही समय पर पारण करें, अच्छा हो कि पहले किसी ब्राह्मण या ज़रूरतमंद को भोजन कराएँ।
मुख्य बातें
- वर्ष में 24 एकादशियाँ होती हैं, हर एक का अपना नाम और महत्व।
- अन्न और दालें वर्जित हैं; फल, दूध और व्रत के आटे मान्य हैं।
- द्वादशी को सूर्योदय के बाद और द्वादशी समाप्ति से पहले, हरि वासर टालकर पारण करें।
- दो तारीखें हों तो स्मार्त और वैष्णव परंपरा का अंतर है; अपनी परंपरा मानें।